इजराइल

१४ मई, १९४८ को इजराइल ने अपनी आजादी की घोषणा की। इसके चौबीस घंटे के अंदर मिस्र, जोर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की फौजों ने इजराइल पर हमला कर दिया। लिहाजा, अपने पूर्वजों की धरती पर फिर से संप्रभु देश बने इजराइल को अपनी रक्षा के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।

यह लड़ाई रूक-रूक कर कोई सवा साल तक चली। नवगठित इजराइली फौज ने पूरे साजो-सामान के बगैर भी बहादुरी से संघर्ष किया और आखिरकार हमलावरों को पीछे धकेल दिया। इस युद्ध में ६००० से भी ज्यादा इजराइली जानें गईं। यह संख्या तब की इजराइली आबादी की करीब एक फीसदी थी। इस युद्ध को इजराइल के स्वतंत्रता-संघर्ष का नाम दिया गया।

सन्‌ १९४९ के शुरूआती महीनों में संयुक्त राष्ट्र संघ के सौजन्य से इजराइल और प्रत्येक हमलावर देश के बीच सीधी वार्ता शुरू हुई। सिर्फ इराक ने वार्ता करने से इन्कार कर दिया। बहरहाल, वार्ता करने वाले देशों के साथ समझौते किए गए जिसमें युद्ध की समाप्ति की स्थिति परिलक्षित होती थी।

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राष्ट्र निर्माण
युद्ध समाप्त हुआ। अब इजराइल ने लम्बे संघर्षों के बाद हासिल अपनी आजादी को सींचने और संवारने का काम शुरू किया। २५ जनवरी, १९४९ को पहला राष्ट्रीय चुनाव हुआ। करीब ८५ फीसदी नागरिकों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और १२० सदस्यीय कनेसेट (संसद) का चुनाव किया।

इजराइल देश बनाने में जिन दो लोगों ने नेतृत्व प्रदान किया था, वे आजादी के बाद भी नेता बने रहे। यहूदी एजेंसी के प्रमुख डेविड बेन-गुरियन को पहला प्रधानमंत्री चुना गया और वर्ल्ड जिमनास्ट आर्गेनाइजेशन के प्रमुख खाइम वाइजमैन को संसद ने पहला राष्ट्रपति चुना। ११ मई, १९४९ को इजराइल संयुक्त राष्ट्र संघ का ५५वां सदस्य-देश बना।

इजराइल के अस्तित्व में आने के पीछे निर्वासितों के एकत्र होने' की अवधारणा थी। इसी अवधारणा के तहत इजराइल ने अपने दरवाजे खोल दिए - दुनिया भर में फैले हर यहूदी को यह अधिकार दिया गया कि वे इजराइल आएँ और नागरिकता हासिल करें। आजादी के महज चार महीने के अंदर करीब ५० हजार यहूदी आए इनमें से ज्यादातर वे थे जो नाजी यातना शिविर से बच गए थे। १९५१ के अंत तक कुल ६ लाख ८७ हजारस्त्री-पुरुष-बच्चे इजराइल आए। इनमें से तकरीबन तीन लाख वे लोग थे जो अरब देशों से शरणार्थी के रूप में आए थे।

स्वतंत्रता संग्राम के खर्च और तेजी से बढ़ती आबादी ने देश की अर्थ-व्यवस्था पर गहरा दबाव डाला। इसका सामना करने के लिए देश ने मितव्ययता और विदेशी मदद का सहारा लिया। अमेरिकी सरकार द्वारा दी गई मदद, अमेरिकी बैंको द्वारा दिए गए कजर्, प्रवासी यहूदियों द्वारा दी गई दान-राशि और जर्मनी से प्राप्त क्षति-राशि का इस्तेमाल विकास-कार्यों के लिए किया गया। नए घर बनाए गए, कृषि का मशीनीकरण किया गया, व्यापारिक बेड़े बनाए गए, राष्ट्रीय एयरलाइन खड़ी की गई, उपलब्ध खनिजों का दोहन किया गया, उद्योगों का विकास किया गया और सड़क, बिजली व दूर-संचार का नेटवर्क तैयार किया गया।

पहले दशक की समाप्ति तक औद्योगिक उत्पादन दोगुना हो गया और कामगारों की तादाद भी दोगुनी हो गई। औधोगिक निर्यात चौगुना हो गया। विशाल भू-क्षेत्र को कृषि के अंतर्गत लाया गया। ५० हजार एकड़ से भी ज्यादा बंजर इलाके में वनीकरण किया गया। करीब ८०० किलोमीटर लंबे हाइवे के दोनों ओर पौधे लगाए गए। इन प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि मांस और अनाज को छोड़ कर बाकी खाद्य पदार्थों के मामले में देश आत्मनिर्भर हो गया।

देश बनने के पूर्व यहूदी समुदाय ने जिस शिक्षा-प्रणाली को विकसित किया था, उसे अब बड़े पैमाने पर लागू किया गया। पांच से चौदह साल के बच्चों के लिए शिक्षा निःशुल्क और अनिवार्य कर दी गई। सन्‌ १९७८ से १६ साल की उम्र तक शिक्षा अनिवार्य और १८ साल की उम्र तक मुफ्त कर दी गई है। सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियाँ खूब फली-फूलीं। इसमें मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका और पश्चिमी तत्वों का संगम था। दुनिया के कोने-कोने से आए यहूदियों ने न सिर्फ अपने समुदाय की खास परंपराओं को, बल्कि उन स्थानों की संस्कृति को भी साथ लाया जहाँ वे पीढ़ियों से बसे हुए थे। जब इजराइल ने अपनी दसवीं सालगिरह मनाई तो उसकी आबादी २० लाख को पार कर चुकी थी।

यूजेर बेन-येहुदा (१८५८-१९२२) ने हिब्रू को बोली जाने वाली भाषा के रूप में विकसित करने की मुहिम छेड़ी। सन्‌ १८८१ में इजराइल की धरती पर आने के बाद उन्होंने लोगों के घरों और स्कूलों में हिब्रू भाषा के प्रयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने हजारों नए शब्द गढ़े और हिब्रू भाषा में दो पत्रिकाओं की शुरूआत की। उन्होंने हिब्रू भाषा समिति (१८९६) के पुनर्गठन में भी सहयोग किया। उन्होंने सन्‌ १९१० में प्राचीन और आधुनिक हिब्रू भाषा का शब्द-कोच्च बनाने का कामभी छेड़ा। कुल १७ अंको के इस शब्द-कोच्च के कई अंक उन्होंने खुद तैयार किए। उनके बाद उनकी दूसरी पत्नी और बेटे ने मिल कर यह काम जारी रखा और १९५९ तक संपन्न किया।

आइखमैन ट्रायल
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजी प्रोग्राम के प्रमुख एडोल्फ आइखमैन को लाया गया और उन पर इजराइल के नाजियों और नाजियों का साथ देने वालों को दंड देने वाले कानून (१९५०) के तहत मुकद्मा चलाया गया। यह मुकद्मा अप्रैल, १९६१ में शुरू हुआ। आइखमैन को यहूदियों और मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी पाया गया और उसे मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन अपील खारिज हो गई। यह पहला और आखिरी मौका था जब इजराइली कानून के तहत किसी को मृत्यु दंड दिया
गया।

 
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